क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे

क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे

क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे
शहर-ए-दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे
ज़ुबैर रिज़वी


Kyoon mata-e-dil ke lut jaane ka koee gam kare
Shahar-e-dillee mein to aise vaaqie hote rahe
Zubair rizavee