न ख्वाहिशें हैं न शिकवे हैं अब न ग़म हैं कोई

न ख्वाहिशें हैं न शिकवे हैं अब न ग़म हैं कोई

न ख्वाहिशें हैं न शिकवे हैं अब न ग़म हैं कोई,
ये बेख़ुदी भी कैसे कैसे ग़ुल खिलाती है।


Na Khwahishe Hain Na Shikwe Hain Ab Na Gham Hai Koi,
Yeh Bekhudi Bhi Kaise Kaise Gul Khilati Hai.